Author name: TheGita Hindi

अध्याय ११ शलोक ५

अध्याय ११ शलोक ५ The Gita – Chapter 11 – Shloka 5 Shloka 5  श्रीभगवान् बोले —–हे पार्थ ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृति वाले अलौकिक रूपों को देख ।। ५ ।। The Blessed lord said: Behold O Dear Arjuna, as I reveal to you hundreds and […]

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अध्याय ११ शलोक ४

अध्याय ११ शलोक ४ The Gita – Chapter 11 – Shloka 4 Shloka 4  हे प्रभो ! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है—ऐसा आप मानते है, तो हे योगेश्वर ! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइये ।। ४।। O Great Lord of Yoga, if you think of me as being

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अध्याय ११ शलोक ३

अध्याय ११ शलोक ३ The Gita – Chapter 11 – Shloka 3 Shloka 3  हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोतम ! आपके ज्ञान,ऐश्वर्य,शक्त्ति,बल,वीर्य और तेज से युक्त्त ऐश्वर्य रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ ।। ३ ।। O Blessed Lord, Your divine words

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अध्याय ११ शलोक २

अध्याय ११ शलोक २ The Gita – Chapter 11 – Shloka 2 Shloka 2  क्योंकि हे कमल नेत्र ! मैंने आपसे भूतों की उत्पति और प्रलय विस्तार पूर्वक सुने है तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है ।। २ ।। Arjuna continued: O Lotus-Eyed One, You have fully explained to me the truth of birth

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अध्याय ११ शलोक १

अध्याय ११ शलोक १ The Gita – Chapter 11 – Shloka 1 Shloka 1  अर्जुन बोले—मुझ पर अनुग्रह करने के लिये आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया है ।। १ ।। Arjuna thankfully replied: O Lord it is because of Your mercy alone that

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अध्याय १० शलोक ४२

अध्याय १० शलोक ४२ The Gita – Chapter 10 – Shloka 42 Shloka 42  अथवा हे अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है । मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपनी योग शक्त्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ  ।। ४२ ।। But of what help is it to you

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अध्याय १० शलोक ४१

अध्याय १० शलोक ४१ The Gita – Chapter 10 – Shloka 41 Shloka 41  जो-जो भी विभूति युक्त्त अर्थात् ऐश्वर्य युक्त्त, कान्ति युक्त्त और शक्त्ति युक्त्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्त्ति जान ।। ४१ ।। Whatever is beautiful and good, whatever has glory and power is only a portion

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अध्याय १० शलोक ४०

अध्याय १० शलोक ४० The Gita – Chapter 10 – Shloka 40 Shloka 40  हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का विस्तार तो तेरे लिये एक देश से अर्थात् संक्षेप से कहा है ।। ४० ।। There is no end of my divine qualities, Arjuna. What I have

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अध्याय १० शलोक ३९

अध्याय १० शलोक ३९ The Gita – Chapter 10 – Shloka 39 Shloka 39  और हे अर्जुन ! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मै ही हूँ, क्योंकि ऐसा वह चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो ।। ३९ ।। Arjuna, know that I am the

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अध्याय १० शलोक ३८

अध्याय १० शलोक ३८ The Gita – Chapter 10 – Shloka 38 Shloka 38  मैं दमन करने वालों का दण्ड अर्थात् दमन करने की शक्त्ति हूँ, जीतने की इच्छा वालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्व ज्ञान मै ही हूँ ।। ३८ ।। I am the sceptre

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