Author name: TheGita Hindi

अध्याय १७ शलोक  १०

अध्याय १७ शलोक  १० The Gita – Chapter 17 – Shloka 10 Shloka 10  जो भोजन अधपका, रस रहित, दुर्गन्ध युक्त्त बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है ।। १० ।। Those people who strive on darkness and evil, eat foods that are impure, often […]

अध्याय १७ शलोक  १० Read More »

अध्याय १७ शलोक  ९

अध्याय १७ शलोक  ९ The Gita – Chapter 17 – Shloka 9 Shloka 9  कड़वे, खट्टे, लवण युक्त्त् बहुत गरम तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं ।। ९ ।। The foods that appeal to the passionate people

अध्याय १७ शलोक  ९ Read More »

अध्याय १७ शलोक  ८

अध्याय १७ शलोक  ८ The Gita – Chapter 17 – Shloka 8 Shloka 8  आयु, बुद्भि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रस युक्त्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय —- ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्विक पुरुष को प्रिय होते हैं ।। ८ ।।

अध्याय १७ शलोक  ८ Read More »

अध्याय १७ शलोक  ७

अध्याय १७ शलोक  ७ The Gita – Chapter 17 – Shloka 7 Shloka 7  भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है । और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं । उनके इस पृथक्-पृथक् भेद को तू मुझसे सुन ।। ७ ।। O Arjuna,

अध्याय १७ शलोक  ७ Read More »

अध्याय १७ शलोक  ६

अध्याय १७ शलोक  ६ The Gita – Chapter 17 – Shloka 6 Shloka 6  जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्त:करण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू असुर स्वभाव वाले जान ।। ६ ।। …and those who foolishly suppress the pure and natural life-giving

अध्याय १७ शलोक  ६ Read More »

अध्याय १७ शलोक  ५

अध्याय १७ शलोक  ५ The Gita – Chapter 17 – Shloka 5 Shloka 5  जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मन:कल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त्त हैं ।। ५ ।। Those men who are selfish, corrupt, conceited, and

अध्याय १७ शलोक  ५ Read More »

अध्याय १७ शलोक  ४

अध्याय १७ शलोक  ४ The Gita – Chapter 17 – Shloka 4 Shloka 4  सात्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूत गणों को पूजते हैं ।। ४ ।। Beings who are pure in heart and mind, who are good- natured

अध्याय १७ शलोक  ४ Read More »

अध्याय १७ शलोक  ३

अध्याय १७ शलोक  ३ The Gita – Chapter 17 – Shloka 3 Shloka 3  हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्बा उनके अन्त:करण के अनुरूप होती है, यह पुरुष श्रद्बामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्बा वाला है, वह स्वयं भी वही है ।। ३ ।। The faith of every individual on earth O Arjuna

अध्याय १७ शलोक  ३ Read More »

अध्याय १७ शलोक  २

अध्याय १७ शलोक  २ The Gita – Chapter 17 – Shloka 2 Shloka 2  श्री भगवान् बोले —– मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्बा सात्विको और राजसी तथा तामसी —–ऐसे तीनों प्रकार की होती है । उसको तू मुझ से सुन ।। २ ।। The Blessed Lord said: O

अध्याय १७ शलोक  २ Read More »

अध्याय १७ शलोक  १

अध्याय १७ शलोक  १ The Gita – Chapter 17 – Shloka 1 Shloka 1  अर्जुन बोले —–हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्याग कर श्रद्बा से युक्त्त हुए देवादि का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन से है ? सात्विकी है ; अथवा राजसी किंवा तामसी ।। १ ।। Arjuna asked the

अध्याय १७ शलोक  १ Read More »

Scroll to Top