Author name: TheGita Hindi

अध्याय ११ शलोक २६,२७

अध्याय ११ शलोक २६,२७ The Gita – Chapter 11 – Shloka 26,27 Shloka 26,27  वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सब-के-सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों से बड़े […]

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अध्याय ११ शलोक २५

अध्याय ११ शलोक २५ The Gita – Chapter 11 – Shloka 25 Shloka 25  दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलय काल की अग्नि के समान आपके मुखों कों देख कर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ । इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हों ।। २५

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अध्याय ११ शलोक २४

अध्याय ११ शलोक २४ The Gita – Chapter 11 – Shloka 24 Shloka 24  क्योंकि हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त्त तथा फैलाये हुए मुख और प्रकाश मान विशाल नेत्रों से युक्त्त आपको देखकर भयभीत अन्त:करण वाला मैं धीरज ओर शान्ति नहीं पाता हूँ ।। २४ ।। O

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अध्याय ११ शलोक २३

अध्याय ११ शलोक २३ The Gita – Chapter 11 – Shloka 23 Shloka 23  हे महाबाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जड़ा और पैरो वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान् रुपको देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा

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अध्याय ११ शलोक २२

अध्याय ११ शलोक २२ The Gita – Chapter 11 – Shloka 22 Shloka 22  जो ग्यारह रूद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्य गण, विश्वेदेव अश्विनी कुमार तथा मरुदगण और पितरों का समुदाय तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय है —-वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते है ।। २२ ।। The Rudras

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अध्याय ११ शलोक २१

अध्याय ११ शलोक २१ The Gita – Chapter 11 – Shloka 21 Shloka 21  वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते है और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते है तथा महर्षि और सिद्धो के समुदाय ‘कल्याण हो’ ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं

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अध्याय ११ शलोक २०

अध्याय ११ शलोक २० The Gita – Chapter 11 – Shloka 20 Shloka 20  हे महात्मन् ! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आप से ही परिपूर्ण है तथा आप के इस अलौकिक और भयंकर रूप को देख कर तीनो लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं  ।।

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अध्याय ११ शलोक १९

अध्याय ११ शलोक १९ The Gita – Chapter 11 – Shloka 19 Shloka 19  आपको आदि, अन्त, और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त्त, अनन्त भुजा वाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूप मुख वाले और अपने तेज से इस जगत् को संतप्त करते हुए देखता हूँ  ।। १९ ।। O Great Lord,

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अध्याय ११ शलोक १८

अध्याय ११ शलोक १८ The Gita – Chapter 11 – Shloka 18 Shloka 18  आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हैं, आप ही इस जगत् के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक है और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं । ऐसा मेरा मत हैं ।। १८ ।। You

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अध्याय ११ शलोक १७

अध्याय ११ शलोक १७ The Gita – Chapter 11 – Shloka 17 Shloka 17  आप को मैं मुकुट युक्त्त, गदा युक्त्त और चक्र युक्त्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुञ्ज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सद्र्श ज्योति युक्त्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेय स्वरूप देखता हूँ ।।  ।।

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