Author name: TheGita Hindi

अध्याय १४ शलोक ११

अध्याय १४ शलोक ११ The Gita – Chapter 14 – Shloka 11 Shloka 11  जिस समय इस देह में तथा अन्त:करण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्त्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्वगुण बढ़ा है ।। ११ ।। When the light of true knowledge and wisdom sorrounds and comes forth […]

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अध्याय १४ शलोक १०

अध्याय १४ शलोक १० The Gita – Chapter 14 – Shloka 10 Shloka 10  हे अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबा कर सत्वगुण, तत्वगुण और तमोगुण को दबा कर रजोगुण, वैसे ही सत्वगुण और रजोगुण को दबा कर तमोगुण होता है अर्थात् बढ़ता है ।। १० ।। At times O Arjuna, the first element

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अध्याय १४ शलोक ९

अध्याय १४ शलोक ९ The Gita – Chapter 14 – Shloka 9 Shloka 9  हे अर्जुन ! सत्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढककर प्रमाद में भी लगाता है ।। ९ ।। In reality O son of Kunti, SATTVA (or Goodness) binds one to happiness; RAJAS leads

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अध्याय १४ शलोक ८

अध्याय १४ शलोक ८ The Gita – Chapter 14 – Shloka 8 Shloka 8  हे अर्जुन सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान । वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बांधता है ।। ८ ।। But you should also know O Arjuna, that darkness and

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अध्याय १४ शलोक ७

अध्याय १४ शलोक ७ The Gita – Chapter 14 – Shloka 7 Shloka 7  हे अर्जुन ! राग रूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान । वह इस जीवात्मा को कर्मो के और उनके फल के सम्बन्ध से बांधता है ।। ७ ।। RAJAS, dear Arjuna, is that natural element representing passion which

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अध्याय १४ शलोक ६

अध्याय १४ शलोक ६ The Gita – Chapter 14 – Shloka 6 Shloka 6  हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में सत्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात् उसके अभिमान से बांधता है ।। ६ ।। Arjuna, understand

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अध्याय १४ शलोक ५

अध्याय १४ शलोक ५ The Gita – Chapter 14 – Shloka 5 Shloka 5  हे अर्जुन ! सत्वगुण, रजोगुण, और तमोगुण —-ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं ।। ५ ।। Arjuna, that NATURE is made of three parts, namely: SATTVA (the light representing goodness); RAJAS (fire representing passion),

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अध्याय १४ शलोक ४

अध्याय १४ शलोक ४ The Gita – Chapter 14 – Shloka 4 Shloka 4  हे अर्जुन ! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियां अर्थात् शरीर धारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सब की गर्भ धारण करने वाली माता है और मै बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ ।। ४ ।।

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अध्याय १४ शलोक ३

अध्याय १४ शलोक ३ The Gita – Chapter 14 – Shloka 3 Shloka 3  हे अर्जुन ! मेरी महत्-ब्रह्म रूप मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात् गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदाय रूप गर्भ को स्थापन करता हूँ । उस जड़ चेतन के संयोग से सब भूतों की

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अध्याय १४ शलोक २

अध्याय १४ शलोक  २ The Gita – Chapter 14 – Shloka 2 Shloka 2  इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुन: उत्पन्न नहीं होते और प्रलय काल में भी व्याकुल नहीं होते ।। २ ।। By fully learning, understanding and practising this wisdom,

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