Author name: TheGita Hindi

अध्याय १६ शलोक  १३

अध्याय १६ शलोक  १३ The Gita – Chapter 16 – Shloka 13 Shloka 13  वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूंगा । मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जायगा ।। १३ ।। It is common to hear

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अध्याय १६ शलोक  १२

अध्याय १६ शलोक  १२ The Gita – Chapter 16 – Shloka 12 Shloka 12  वे आशा की सैकड़ों फांसियों से बँधे हुए मनुष्य काम क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिये अन्याय पूर्वक धनादि पदार्थो का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं ।। १२ ।। The Blessed Lord described: They are bound to this

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अध्याय १६ शलोक  ११

अध्याय १६ शलोक  ११ The Gita – Chapter 16 – Shloka 11 Shloka 11  तथा वे मृत्यु पर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, विषय भोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और ‘इतना ही सुख है’ इस प्रकार मानने वाले होते हैं ।। ११ ।। These evil-doers become obsessed with their several

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अध्याय १६ शलोक  १०

अध्याय १६ शलोक  १० The Gita – Chapter 16 – Shloka 10 Shloka 10  वे दम्भ, मान और मद से युक्त्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर अज्ञान से मिथ्या सिद्भान्तों को ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं ।। १० ।। These corrupt

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अध्याय १६ शलोक  ९

अध्याय १६ शलोक  ९ The Gita – Chapter 16 – Shloka 9 Shloka 9  इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके — जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्भि मन्द है, वे सबका अपकार करने वाले कूरकर्मी मनुष्य केवल जगत् के नाश के लिये ही समर्थ होते हैं ।। ९ ।। Standing firmly by

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अध्याय १६ शलोक  ८

अध्याय १६ शलोक  ८ The Gita – Chapter 16 – Shloka 8 Shloka 8  वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है । इसके सिवा और क्या है ? ।।

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अध्याय १६ शलोक  ७

अध्याय १६ शलोक  ७ The Gita – Chapter 16 – Shloka 7 Shloka 7  आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति —इन दोनों को ही नहीं जानते । इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्भि है, न श्रेष्ट आचरण है और न सत्य भाषण ही है ।। ७ ।। Evil men O Partha. do not

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अध्याय १६ शलोक  ६

अध्याय १६ शलोक  ६ The Gita – Chapter 16 – Shloka 6 Shloka 6  हे अर्जुन ! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला, दूसरा आसुरी प्रकृति वाला । उनमे से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तार पूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति

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अध्याय १६ शलोक  ५

अध्याय १६ शलोक  ५ The Gita – Chapter 16 – Shloka 5 Shloka 5  दैवी-सम्पदा मुक्त्ति के लिये और आसुरी-सम्पदा बाँधने के लिये मानी गयी है । इसलिये हे अर्जुन ! तू शोक मत कर ; क्योंकि तू दैवी-सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है ।। ५ ।। The qualities that exist within a person with

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