Author name: TheGita Hindi

अध्याय १८ शलोक  १७

अध्याय १८ शलोक  १७ The Gita – Chapter 18 – Shloka 17 Shloka 17  जिस पुरुष के अन्त:करण में ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्भि सांसारिक पदार्थो में और कर्मों में लिपायमान नहीं होतीं, वह पुरुष इन सब लोकों को मार कर भी वास्तव में न तो मारता है और न […]

अध्याय १८ शलोक  १७ Read More »

अध्याय १८ शलोक  १६

अध्याय १८ शलोक  १६ The Gita – Chapter 18 – Shloka 16 Shloka 16  परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्भ बुद्भि होने के कारण उस विषय में यानि कर्मों के होने में केवल शुद्भ स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्भि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता ।। १६ ।। Therefore dear

अध्याय १८ शलोक  १६ Read More »

अध्याय १८ शलोक  १५

अध्याय १८ शलोक  १५ The Gita – Chapter 18 – Shloka 15 Shloka 15  मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है —- उसके ये पांचों कारण हैं ।। १५ ।। Whether a being’s means of actions are his body, mind, or speech, all of his actions whether

अध्याय १८ शलोक  १५ Read More »

अध्याय १८ शलोक  १४

अध्याय १८ शलोक  १४ The Gita – Chapter 18 – Shloka 14 Shloka 14  इस विषय में अर्थात् कर्मों की सिद्भि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के कारण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाऍ और वैसे ही पाँचवां हेतु दैव है ।। १४ ।। The Lord described the five causes of action: The

अध्याय १८ शलोक  १४ Read More »

अध्याय १८ शलोक  १३

अध्याय १८ शलोक  १३ The Gita – Chapter 18 – Shloka 13 Shloka 13  हे महाबाहो ! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्भि के ये पांच हेतु कर्मों का अन्त करने के लिये उपाय बतलाने वाले सांख्यशास्त्र में कहे गये हैं, उनको तू मुझ से भली भाँति जान ।। १३ ।। O Mighty-armed Arjuna, learn and realize from

अध्याय १८ शलोक  १३ Read More »

अध्याय १८ शलोक  १२

अध्याय १८ शलोक  १२ The Gita – Chapter 18 – Shloka 12 Shloka 12  कर्म फल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात् अवश्य होता है, किंतु कर्म फल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल

अध्याय १८ शलोक  १२ Read More »

अध्याय १८ शलोक  ११

अध्याय १८ शलोक  ११ The Gita – Chapter 18 – Shloka 11 Shloka 11  क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य के द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है ; इसलिय जो कर्म फल का त्यागी है, वही त्यागी है — यह कहा जाता है ।। ११ ।। Understand, Best of Men

अध्याय १८ शलोक  ११ Read More »

Scroll to Top